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बालोद में ‘60-40’ का कथित खेल? विकास के नाम पर जनता की जेब पर डाका और सड़कों की हालत बेहाल!
करोड़ों के काम, महीनों में ध्वस्त निर्माण! ठेकेदारों और जिम्मेदारों की कथित मिलीभगत के आरोपों ने मचाई हलचल—जनता पूछ रही, आखिर विकास का पैसा जा कहां रहा है?

बालोद में ‘60-40’ का कथित खेल? विकास के नाम पर जनता की जेब पर डाका और सड़कों की हालत बेहाल!
करोड़ों के काम, महीनों में ध्वस्त निर्माण! ठेकेदारों और जिम्मेदारों की कथित मिलीभगत के आरोपों ने मचाई हलचल—जनता पूछ रही, आखिर विकास का पैसा जा कहां रहा है?
- बालोद। बालोद में विकास कार्यों की चमक अब सवालों के कटघरे में खड़ी नजर आ रही है। शहर में कहीं सड़कें धंस रही हैं, कहीं पेवर ब्लॉक उखड़ रहे हैं और कहीं निर्माण कार्य समय से पहले ही दम तोड़ रहे हैं। ऐसे में अब जनता के बीच कथित ‘60-40 प्रतिशत’ के खेल की चर्चा ने पूरे विकास तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यदि इन चर्चाओं में जरा भी सच्चाई है और विकास कार्यों की राशि का बड़ा हिस्सा कथित तौर पर कमीशनबाजी में बंट रहा है, तो फिर सवाल यह है कि जनता के हिस्से में आखिर क्या बचता है—टूटी सड़क, उखड़े पेवर ब्लॉक और बार-बार होने वाली मरम्मत?
‘60-40’ का खेल हुआ तो 100% नुकसान जनता का!
लोगों के बीच उठ रही चर्चाओं का सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर ठेकेदार और जिम्मेदार तंत्र के बीच कथित तौर पर हिस्सेदारी तय होती है, तो निर्माण की गुणवत्ता की बलि किसकी दी जाती है?
जवाब साफ है—जनता की।
क्योंकि सरकारी खजाने से निकलने वाला पैसा जनता का है। सड़क टूटेगी तो जनता परेशान होगी, गड्ढे होंगे तो जनता गिरेगी, घटिया निर्माण होगा तो जनता की मेहनत की कमाई से दोबारा मरम्मत होगी।
यानी कथित ‘60-40’ चाहे सच हो या महज चर्चा, नुकसान अगर किसी का हो रहा है तो वह आम जनता का है।
ठेकेदारों की ‘गुणवत्ता’ का दावा अब सड़कें खुद करेंगी!
बालोद में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठाने वालों से पूछा जाता है कि ठेकेदारों के काम पर उंगली क्यों उठाई जा रही है। लेकिन अब सवाल यह है कि उंगली जनता नहीं उठा रही, सड़कें खुद अपनी हालत दिखा रही हैं!
चंद महीनों में धंसती सड़कें, उखड़ते पेवर ब्लॉक और कमजोर निर्माण किसी बयान के मोहताज नहीं। यदि काम गुणवत्तापूर्ण है तो निष्पक्ष तकनीकी जांच से सबकुछ सामने आ जाएगा।
अब बैनर नहीं, ‘बिल’ और ‘बेस’ की जांच हो!
जनता अब केवल विकास के बैनर नहीं देखना चाहती। जनता जानना चाहती है कि निर्माण में कितना पैसा स्वीकृत हुआ, कितना खर्च हुआ, किस ठेकेदार को काम मिला, कौन अधिकारी इसकी निगरानी कर रहा था और निर्माण के बाद गुणवत्ता की जांच किसने की?
अब जरूरत है फाइलों की नहीं, फील्ड की जांच की।
प्रशासन चाहे तो एक जांच में खुल सकता है पूरा ‘विकास मॉडल’!
यदि प्रशासन वास्तव में पारदर्शिता के प्रति गंभीर है तो बालोद के प्रमुख निर्माण कार्यों का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया जाए। पुराने और नए निर्माण की गुणवत्ता जांची जाए, स्वीकृत राशि और वास्तविक खर्च का मिलान हो और जहां भी अनियमितता मिले, वहां जिम्मेदारी तय की जाए।
क्योंकि सवाल किसी एक सड़क का नहीं, जनता के करोड़ों रुपये का है।
अब बालोद की जनता पूछ रही है—अगर ‘60-40’ केवल अफवाह है तो इसकी जांच कराकर सच सामने क्यों नहीं लाया जाता? और अगर यह सच नहीं है, तो फिर विकास कार्य कुछ महीनों में ही क्यों दम तोड़ रहे हैं?
बालोद में अब विकास की असली परीक्षा बैनर पर नहीं, सड़क पर होगी—और इस परीक्षा में जनता ही तय करेगी कि विकास हुआ है या सिर्फ विकास के नाम पर जनता को सपना दिखाया गया है।




