वनांचल की गृहिणी से ‘लखपति दीदी’ तक कुसुम सिन्हा की प्रेरक उड़ान
राखी कारोबार ने बदली जिंदगी, 12 हजार से अधिक इको-फ्रेंडली राखियों की बिक्री; इस सीजन ₹7 लाख आय की उम्मीद
बालोद, 22 अगस्त 2026।
वनांचल की एक साधारण गृहिणी से आत्मनिर्भर महिला और सफल ‘लखपति दीदी’ बनने तक का सफर तय करने वाली डौंडी विकासखंड के ग्राम कुमुड़कट्टा की श्रीमती कुसुम सिन्हा आज महिला सशक्तिकरण की प्रेरक मिसाल बन गई हैं। राज्य सरकार की ‘बिहान’ योजना से जुड़कर उन्होंने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार की राह दिखाई है।
जय मां पहाड़ों वाली स्व-सहायता समूह की अध्यक्ष कुसुम सिन्हा के नेतृत्व में 12 महिलाएं सक्रिय रूप से कार्य कर रही हैं। समूह द्वारा अचार, रंगोली सहित विभिन्न मौसमी उत्पाद तैयार किए जाते हैं। रक्षाबंधन पर्व को देखते हुए समूह ने कई माह पहले से ही पारंपरिक और पर्यावरण-अनुकूल राखियों का निर्माण शुरू कर दिया था।
धान से बांस तक—स्थानीय संसाधनों से बनी राखियों की बढ़ी मांग
कुसुम सिन्हा और समूह की महिलाओं द्वारा धान, चावल, गेहूं, मूंग, बांस और ऊन जैसे स्थानीय संसाधनों से आकर्षक एवं इको-फ्रेंडली राखियां तैयार की जा रही हैं। इन राखियों की बालोद सहित आसपास के कई जिलों में अच्छी मांग है। समूह अब तक करीब 12,000 राखियां बेच चुका है, जबकि इस रक्षाबंधन सीजन में राखी कारोबार से लगभग ₹7 लाख की आय होने की उम्मीद है।
मेहनत और हुनर ने दिलाई ‘लखपति दीदी’ की पहचान
आजीविका संवर्धन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए कुसुम सिन्हा को जिला एवं राज्य स्तर पर ‘लखपति दीदी’ के रूप में सम्मानित किया जा चुका है। उन्होंने ग्रामीण महिलाओं को संदेश देते हुए कहा कि महिलाएं यदि घर की जिम्मेदारियों के साथ स्वरोजगार से जुड़ें तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और समाज में उनकी नई पहचान बनती है।
‘विष्णु भैया’ को राखी की शुभकामनाएं, योजनाओं के लिए जताया आभार
कुसुम सिन्हा ने मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय को अपने बड़े भाई के रूप में संबोधित करते हुए आभार व्यक्त किया और रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि महतारी वंदन योजना और बिहान जैसी पहलें ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
उन्होंने कहा कि महिलाओं की तरक्की और आत्मनिर्भरता की यह पहल “बहनों की तरक्की, परिवार की शान—विष्णु भैया का यही अभियान” के ध्येय को धरातल पर साकार कर रही है।
कुसुम सिन्हा की कहानी सिर्फ राखी बनाने की कहानी नहीं, बल्कि यह उस बदलाव की तस्वीर है, जहां सरकारी योजनाओं, महिला समूहों की मेहनत और स्थानीय हुनर के संगम से गांव की महिलाएं आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं।
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