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ई-रिक्शा ने बदली महिलाओं की राह, अब आत्मनिर्भरता से परिवार की मजबूत हो रही नींव
सेवती और अंजू बनीं ‘दीदी ई-रिक्शा सहायता योजना’ की मिसाल; हर माह 10 से 12 हजार रुपये तक की कमाई, बोलीं—‘विष्णु भैया’ ने बढ़ाया हमारा मान
बालोद, 23 अगस्त 2026। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के सुशासन में संचालित दीदी ई-रिक्शा सहायता योजना महिलाओं के लिए स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता का मजबूत माध्यम बन रही है। जिले की सेवती ठाकुर और अंजू नेताम ने योजना का लाभ लेकर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत किया है और अब दूसरी महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन रही हैं।
⭐ किराये की बचत से बढ़ा कैंटीन का मुनाफा
ग्राम झलमला की सेवती ठाकुर स्व-सहायता समूह से जुड़कर कैंटीन संचालित करती हैं। पहले बाजार से खाद्य सामग्री और कच्चा माल लाने के लिए उन्हें किराये पर वाहन लेना पड़ता था। योजना के तहत ई-रिक्शा मिलने के बाद अब वे स्वयं सामान का परिवहन करती हैं, जिससे किराये की बचत हो रही है और समूह के मुनाफे में भी बढ़ोतरी हुई है।
⭐ गृहिणी से बनीं सफल स्वरोजगार संचालक
ग्राम सिवनी की अंजू नेताम पहले गृहिणी थीं। ई-रिक्शा मिलने के बाद उन्होंने इसे कमाई का जरिया बना लिया। अब वे स्कूली बच्चों को घर से स्कूल पहुंचाने-लाने सहित स्थानीय परिवहन सेवाएं देती हैं और इससे प्रतिमाह करीब 10 से 12 हजार रुपये की शुद्ध आय अर्जित कर रही हैं।
⭐ ‘महतारी वंदन’ से मिला अतिरिक्त संबल
अंजू नेताम को महतारी वंदन योजना का भी नियमित लाभ मिल रहा है। उनका कहना है कि महिला सशक्तिकरण से जुड़ी योजनाओं ने उनके भीतर नया आत्मविश्वास पैदा किया है और परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने का अवसर दिया है।
⭐ ‘विष्णु भैया’ के प्रति जताया आभार
सेवती ठाकुर ने मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा—“मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय हम महिलाओं के लिए बड़े भाई की तरह संबल बनकर खड़े हैं। इस मदद के लिए हम अपने विष्णु भैया का दिल से आभार व्यक्त करते हैं।”
📢 दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरक संदेश
सेवती और अंजू की कहानी साफ संदेश देती है—सरकारी योजनाओं की जानकारी लेकर उनका लाभ उठाएं और आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाएं। एक ई-रिक्शा उनके लिए केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि स्वरोजगार, सम्मान और परिवार की आर्थिक मजबूती का माध्यम बन गया है।
महिला सशक्तिकरण तभी सार्थक है, जब योजना का लाभ जमीन पर पहुंचे और महिला अपने पैरों पर खड़ी हो—सेवती और अंजू इसकी जीवंत मिसाल हैं।
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