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सूचना मांगना पड़ा भारी ?

जिला पंचायत बालोद के जनसूचना अधिकारी पर उठे बड़े सवाल, प्रथम अपील के बाद बढ़ी हलचल

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 को शासन-प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू किया गया था, लेकिन जिला पंचायत बालोद से जुड़ा एक मामला अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
जनहित से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाने वाले समाजसेवी उमेश कुमार सेन द्वारा ग्राम पंचायतों में हुए विकास कार्यों की जानकारी प्राप्त करने हेतु सूचना का अधिकार (RTI) आवेदन प्रस्तुत किया गया था। आवेदन में वर्ष 2019-20 से 2025-26 तक विभिन्न ग्राम पंचायतों में हुए निर्माण कार्यों, योजनाओं, भुगतान राशि, प्राक्कलन, कार्य आदेश सहित अन्य दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई थी।
बताया जा रहा है कि जिला पंचायत बालोद के जनसूचना अधिकारी द्वारा जानकारी उपलब्ध कराने के बजाय आवेदक को अलग-अलग ग्राम पंचायतों में आवेदन प्रस्तुत करने की सलाह दी गई। इसके बाद पूरे मामले को लेकर प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।
⚠️ उठ रहे कई अहम सवाल
इस मामले के सामने आने के बाद लोगों के बीच कई सवाल चर्चा का विषय बन गए हैं—
जब करोड़ों रुपये की योजनाएं जिला पंचायत के माध्यम से संचालित होती हैं, तो क्या संबंधित अभिलेख जिला पंचायत में उपलब्ध नहीं हैं?
यदि रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, तो योजनाओं की निगरानी एवं समीक्षा कैसे की जा रही है?
और यदि रिकॉर्ड मौजूद है, तो जानकारी देने से परहेज क्यों किया जा रहा है?
सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 6(3) के अनुसार यदि मांगी गई सूचना किसी अन्य कार्यालय से संबंधित हो, तो आवेदन संबंधित विभाग को हस्तांतरित करना जनसूचना अधिकारी की जिम्मेदारी मानी जाती है। ऐसे में आवेदक को अलग-अलग पंचायतों में आवेदन लगाने की सलाह दिए जाने को कानून की मूल भावना के विपरीत बताया जा रहा है।
📄 प्रथम अपील दायर
जनसूचना अधिकारी के जवाब से असंतुष्ट होकर समाजसेवी उमेश कुमार सेन ने प्रथम अपील दायर कर मामले में निष्पक्ष कार्रवाई एवं संपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराने की मांग की है।
अपील में यह भी उल्लेख किया गया है कि योजनाओं से संबंधित वित्तीय एवं तकनीकी अभिलेख जिला पंचायत स्तर पर उपलब्ध होना स्वाभाविक है, इसलिए जानकारी उपलब्ध नहीं होने का तर्क कई सवाल खड़े करता है।
🔥 जनता के बीच तेज हुई चर्चा
मामले के सामने आने के बाद आम लोगों के बीच भी चर्चा तेज हो गई है। लोगों का कहना है कि यदि सूचना मांगने वाले नागरिकों को ही कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ेंगे, तो पारदर्शिता और जवाबदेही केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाएगी।
अब सभी की निगाहें प्रथम अपीलीय अधिकारी के फैसले पर टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि यदि मामले में गंभीरता से कार्रवाई होती है, तो यह सूचना के अधिकार को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

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