नेवारीकला में ‘मुक्तिधाम’ तक पहुंचना भी बना अग्निपरीक्षा!
बारिश ने रास्ते को बनाया तालाब, पानी और कीचड़ के बीच निकल रही अंतिम यात्राएं; ग्रामीणों का सवाल—क्या मरने के बाद भी नहीं मिलेगी सम्मानजनक विदाई?

नेवारीकला में ‘मुक्तिधाम’ तक पहुंचना भी बना अग्निपरीक्षा!
बारिश ने रास्ते को बनाया तालाब, पानी और कीचड़ के बीच निकल रही अंतिम यात्राएं; ग्रामीणों का सवाल—क्या मरने के बाद भी नहीं मिलेगी सम्मानजनक विदाई?
बालोद। ग्राम नेवारीकला में बारिश ने एक ऐसी तस्वीर सामने ला दी है, जिसने गांव की बदहाल व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां मुक्तिधाम तक पहुंचने वाला रास्ता बारिश के पानी में डूबकर मानो जलमार्ग बन गया है। हालात ऐसे हैं कि किसी व्यक्ति की अंतिम यात्रा भी अब आसान नहीं रही। परिजनों और ग्रामीणों को शव लेकर पानी, कीचड़ और फिसलन भरे रास्ते से गुजरने की मजबूरी झेलनी पड़ रही है।
बरसात के दिनों में यह समस्या हर साल सामने आती है। जैसे ही तेज बारिश होती है, मुक्तिधाम की ओर जाने वाला मार्ग जलमग्न हो जाता है। ऐसे में अंतिम संस्कार के लिए शव को ले जाना बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाता है। एक तरफ अपनों को खोने का गम, दूसरी तरफ बदहाल रास्ते की पीड़ा—ग्रामीणों की मुश्किलें दोगुनी हो जाती हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि मुक्तिधाम कोई सामान्य स्थान नहीं, बल्कि हर व्यक्ति की अंतिम यात्रा का पड़ाव है। ऐसे महत्वपूर्ण स्थल तक पहुंचने वाला मार्ग यदि बारिश में ही बंद हो जाए, तो यह व्यवस्था की गंभीर अनदेखी को दर्शाता है। पानी से भरे रास्ते में फिसलने और दुर्घटना की आशंका भी बनी रहती है।
ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि मुक्तिधाम तक जाने वाले मार्ग का स्थायी समाधान किया जाए। सड़क को ऊंचा कर पक्का निर्माण कराने के साथ ही जल निकासी की उचित व्यवस्था की जाए, ताकि बरसात में किसी परिवार को अपने प्रियजन की अंतिम विदाई के दौरान इस तरह की परेशानी न उठानी पड़े।
ग्रामीणों की दो टूक—‘जीते जी सड़क नहीं मिली, कम से कम अंतिम यात्रा का रास्ता तो सुरक्षित हो!’
अब सवाल यह है कि क्या जिम्मेदारों की नजर इस जलमग्न रास्ते पर पड़ेगी? क्या नेवारीकला के मुक्तिधाम तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को हर बारिश में इसी तरह पानी और कीचड़ से जूझना पड़ेगा, या फिर प्रशासन इस बार इस समस्या का स्थायी समाधान करेगा?




