स्कूलों में शिक्षक नहीं, फिर भी शिक्षक ‘अटैचमेंट’ में! एक शिक्षिका के भरोसे 40 मासूमों का भविष्य
गंजपारा प्राथमिक विद्यालय में पहली से पांचवीं तक की जिम्मेदारी एक शिक्षिका पर—कहीं कार्यालय, कहीं छात्रावास तो कहीं अन्य विभागों में अटैचमेंट ने बिगाड़ी सरकारी स्कूलों की व्यवस्था!

स्कूलों में शिक्षक नहीं, फिर भी शिक्षक ‘अटैचमेंट’ में! एक शिक्षिका के भरोसे 40 मासूमों का भविष्य
गंजपारा प्राथमिक विद्यालय में पहली से पांचवीं तक की जिम्मेदारी एक शिक्षिका पर—कहीं कार्यालय, कहीं छात्रावास तो कहीं अन्य विभागों में अटैचमेंट ने बिगाड़ी सरकारी स्कूलों की व्यवस्था!
बालोद। सरकारी स्कूलों में बच्चों का भविष्य संवारने के लिए नियुक्त शिक्षक यदि स्कूलों में पढ़ाने के बजाय दूसरे कार्यालयों, विभागों और छात्रावासों में अटैच कर दिए जाएं, तो इसका सीधा असर आखिर किस पर पड़ेगा? जवाब साफ है—बच्चों की पढ़ाई और उनके भविष्य पर।
बालोद शहर के गंजपारा स्थित शासकीय प्राथमिक विद्यालय की स्थिति ने शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, यहां करीब 40 विद्यार्थियों की पढ़ाई का जिम्मा एक ही शिक्षिका के भरोसे होने की बात सामने आई है। पहली से पांचवीं तक की कक्षाओं को संभालने वाली एक शिक्षिका के सामने जहां बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की बड़ी चुनौती है, वहीं जिले में शिक्षकों के अन्य स्थानों पर अटैचमेंट को लेकर भी अब सवाल उठने लगे हैं।
शिक्षक स्कूल के लिए हैं या कार्यालयों के लिए?
शिक्षकों की नियुक्ति बच्चों को पढ़ाने और उनकी शिक्षा की नींव मजबूत करने के लिए होती है। लेकिन यदि स्कूलों में शिक्षक कम पड़ जाएं और वही शिक्षक अन्य कार्यालयों, विभागों या छात्रावासों में अटैच होकर सेवाएं देने लगें, तो सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि शिक्षकों की कमी का एक बड़ा कारण अनावश्यक अटैचमेंट भी हो सकता है। यदि शिक्षकों को उनकी मूल पदस्थापना वाले स्कूलों में वापस भेज दिया जाए और उनकी सेवाएं वहीं ली जाएं, जहां बच्चों को वास्तव में उनकी जरूरत है, तो कई स्कूलों में शिक्षकों की कमी काफी हद तक दूर हो सकती है।
एक शिक्षिका कैसे संभाले पांच कक्षाएं?
पहली से पांचवीं तक के बच्चों की उम्र, समझ और पाठ्यक्रम अलग-अलग होते हैं। ऐसे में एक ही शिक्षिका पर पांच कक्षाओं की जिम्मेदारी डालना न केवल बेहद चुनौतीपूर्ण है, बल्कि इससे बच्चों को पर्याप्त समय और व्यक्तिगत मार्गदर्शन मिल पाना भी मुश्किल हो सकता है।
एक तरफ 40 बच्चों का भविष्य और दूसरी तरफ पांच कक्षाओं की जिम्मेदारी—क्या यह व्यवस्था बच्चों के साथ न्याय कर रही है?
अब अटैचमेंट व्यवस्था की समीक्षा जरूरी
लोगों की मांग है कि शिक्षा विभाग जिले के सभी स्कूलों में शिक्षकों की वास्तविक स्थिति की समीक्षा करे। साथ ही यह भी जांच की जाए कि कितने शिक्षक अपनी मूल पदस्थापना वाले स्कूलों के बजाय अन्य कार्यालयों, विभागों या छात्रावासों में अटैच हैं।
यदि किसी स्कूल में शिक्षक की कमी है और उसी जिले में शिक्षक अन्यत्र अटैच हैं, तो सबसे पहले बच्चों की जरूरत को प्राथमिकता देते हुए शिक्षकों को स्कूलों में वापस भेजा जाना चाहिए।
बच्चों के भविष्य से बड़ा कोई ‘अटैचमेंट’ नहीं!
सरकार और शिक्षा विभाग का उद्देश्य हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है। ऐसे में अब समय आ गया है कि ‘अटैचमेंट की व्यवस्था’ से ऊपर ‘बच्चों की शिक्षा’ को रखा जाए।
गंजपारा प्राथमिक विद्यालय की स्थिति ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—
जब शिक्षक स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए नियुक्त हैं, तो फिर उन्हें दूसरे स्थानों पर अटैच क्यों किया जा रहा है?
क्या कार्यालय और छात्रावास बच्चों के भविष्य से ज्यादा जरूरी हैं?
अब देखना होगा कि शिक्षा विभाग इस गंभीर मुद्दे पर कब तक ठोस कदम उठाता है और एक शिक्षिका के भरोसे चल रहे स्कूलों को पर्याप्त शिक्षक कब मिलते हैं।




