कर्रेझर पंचायत में 19 भुगतानों पर उठे सवाल, ₹2.37 लाख के खर्च की जांच की मांग
आरटीआई से मिले दस्तावेजों के आधार पर वित्तीय वर्ष 2021-22 से 2025-26 के बीच एक ही कर्मचारी के खाते में भुगतान दर्ज होने का दावा; बिल, वाउचर और कार्यों के भौतिक सत्यापन की मांग

कर्रेझर पंचायत में 19 भुगतानों पर उठे सवाल, ₹2.37 लाख के खर्च की जांच की मांग
आरटीआई से मिले दस्तावेजों के आधार पर वित्तीय वर्ष 2021-22 से 2025-26 के बीच एक ही कर्मचारी के खाते में भुगतान दर्ज होने का दावा; बिल, वाउचर और कार्यों के भौतिक सत्यापन की मांग
गुरूर। सरकारी राशि के खर्च में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना पंचायतों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। लेकिन गुरूर विकासखंड की ग्राम पंचायत कर्रेझर में सामने आए भुगतान संबंधी दस्तावेजों ने पंचायत के वित्तीय प्रबंधन पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2021-22 से 2025-26 के बीच पंचायत में चपरासी के पद पर पदस्थ रूपराम सेवता के खाते में अलग-अलग कार्यों के नाम पर 19 बार भुगतान दर्ज होने और कुल राशि 2,37,630 रुपये होने का दावा किया गया है।
नाली सफाई से लेकर बोर खनन तक के नाम पर भुगतान
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, वर्ष 2021-22 में नाली सफाई एवं कचरा परिवहन के लिए 20 हजार रुपये, मोटर मरम्मत के लिए 10 हजार रुपये, पाइपलाइन खुदाई के लिए 5 हजार रुपये, मोटर पंप खरीदी के लिए 10 हजार रुपये तथा गली सफाई के लिए 3 हजार रुपये के भुगतान दर्ज हैं।
इसके बाद के वित्तीय वर्षों में सड़क एवं बस्ती मरम्मत सामग्री, नाली सफाई, प्राथमिक शाला की सफाई, पाइपलाइन सामग्री, बोर खनन, मूत्रालय निर्माण और पेयजल व्यवस्था से संबंधित कार्यों के नाम पर भी भुगतान का उल्लेख मिलता है। वर्ष 2024-25 और 2025-26 में जलापूर्ति एवं पेयजल मरम्मत से जुड़े भुगतान भी दर्ज बताए गए हैं।
इन भुगतानों को लेकर अब यह सवाल उठ रहा है कि संबंधित कार्य वास्तव में कितने हुए, सामग्री की खरीदी कहां से की गई और भुगतान की स्वीकृति किन अभिलेखों के आधार पर दी गई। इन बिंदुओं की वास्तविक स्थिति बिलों, वाउचरों, स्वीकृति आदेशों, माप पुस्तिकाओं और कार्यस्थल के भौतिक सत्यापन से ही स्पष्ट हो सकती है।
आरटीआई के बाद मिले बिलों की प्रामाणिकता पर सवाल
मामले की जानकारी मांगने वाले ग्रामीणों का आरोप है कि आरटीआई आवेदन के बाद निर्धारित समय में जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। इसके बाद प्रथम अपील की गई, जिसके पश्चात कुछ बिलों की छायाप्रतियां उपलब्ध कराई गईं। ग्रामीणों का कहना है कि इन बिलों में फर्म का नाम, पता, जीएसटी नंबर और अधिकृत हस्ताक्षर जैसी जानकारियां स्पष्ट नहीं हैं।
हालांकि, केवल जीएसटी नंबर का उल्लेख नहीं होना किसी बिल को अपने आप फर्जी साबित नहीं करता। ऐसे में संबंधित बिल जारी करने वाली फर्म, सामग्री की खरीदी, भुगतान प्राप्त करने वाले पक्ष और कार्यों के वास्तविक निष्पादन की जांच आवश्यक है। जांच के बाद ही दस्तावेजों की प्रामाणिकता और भुगतान की वैधता को लेकर स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
वाउचरों में ‘NA’ और डिजिटल हस्ताक्षर का मामला
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2021-22 के कुछ भुगतान अभिलेखों में सचिव और सरपंच के हस्ताक्षर वाले कॉलम में ‘NA’ दर्ज होने की बात सामने आई है। वहीं, बाद के वर्षों के कुछ वाउचरों में डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) के माध्यम से सत्यापन दर्ज होने का दावा किया गया है।
ऐसे में यह जांचना जरूरी है कि संबंधित भुगतानों को किस स्तर पर स्वीकृति दी गई, कार्यों का सत्यापन किसने किया और भुगतान जारी करने की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुरूप थी या नहीं। अभिलेखों में किसी भी प्रकार की विसंगति मिलने पर संबंधित जिम्मेदारों की भूमिका भी स्पष्ट की जानी चाहिए।
कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ से जांच की मांग
ग्रामीणों ने कलेक्टर बालोद और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। उनकी मांग है कि सभी 19 भुगतानों के बिल, वाउचर, स्वीकृति आदेश और अन्य संबंधित अभिलेखों की जांच के साथ प्रत्येक कार्य का भौतिक सत्यापन कराया जाए। साथ ही, भुगतान प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भूमिका की भी पड़ताल की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि सभी भुगतान नियमानुसार किए गए हैं, तो संबंधित दस्तावेजों और सत्यापन रिपोर्ट के माध्यम से स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। वहीं, जांच में वित्तीय अनियमितता प्रमाणित होने पर नियमानुसार कार्रवाई और राशि की वसूली की जानी चाहिए।
अब सवाल यह है कि कर्रेझर पंचायत में दर्ज 19 भुगतानों के पीछे वास्तविक कार्यों और खर्च का पूरा हिसाब क्या है? इसका जवाब संबंधित अभिलेखों की निष्पक्ष जांच और भौतिक सत्यापन से ही सामने आएगा। फिलहाल, मामले में जांच की मांग के बीच संबंधित पंचायत का पक्ष और आधिकारिक जांच निष्कर्ष सामने आना बाकी है।




