निराशा से आशा भली, वर्तमान को साधना ही सच्ची साधना” — शासन दीपक श्री अक्षय मुनि जी मसा
जैन मुनि ने सत्य, तपस्या, आत्मजागरण, गौ रक्षा और राष्ट्र धर्म के पालन का दिया संदेश; संकेत ललवानी ने 7 और अजय बाफना ने 4 उपवास तपस्या का प्रत्याख्यान ग्रहण किया।

निराशा से आशा भली, वर्तमान को साधना ही सच्ची साधना” — शासन दीपक श्री अक्षय मुनि जी मसा
जैन मुनि ने सत्य, तपस्या, आत्मजागरण, गौ रक्षा और राष्ट्र धर्म के पालन का दिया संदेश; संकेत ललवानी ने 7 और अजय बाफना ने 4 उपवास तपस्या का प्रत्याख्यान ग्रहण किया।
शासन दीपक श्री अक्षय मुनि जी मसा ने अपने प्रवचन में जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हमारा जीवन आशाओं से भरा हुआ है, लेकिन इसमें निराशा भी आती है। निराशा की तुलना में आशा बेहतर है, क्योंकि निराशा व्यक्ति को समय से पहले ही कमजोर कर देती है। आशा जीवन को सरल बनाती है, जबकि निराशा मनुष्य को हताश कर देती है। उन्होंने कहा कि जहां आशा और निराशा दोनों के प्रभाव से ऊपर उठकर वर्तमान में जीना सीखा जाता है, वहीं जीवन की वास्तविक साधना शुरू होती है। वर्तमान को साधना सामान्य बात नहीं है, क्योंकि धारणाओं में उलझा व्यक्ति वर्तमान का सामना नहीं कर पाता।
उन्होंने कहा कि सामान्य जन अनेक धारणाओं को पकड़कर बैठे रहते हैं, भले ही उन्हें इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़े। धारणाएं और व्यवस्थाएं जब बंधन बन जाती हैं, तब व्यक्ति उनसे आगे नहीं बढ़ पाता। संसार में अनेक व्यवस्थाएं धारणाओं के आधार पर चलती हैं। उन्होंने भारत के अतीत का उल्लेख करते हुए कहा कि देश को गुलामी से मुक्त होने और आगे बढ़ने के लिए पुरानी सोच से बाहर निकलना जरूरी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वर्ष 2047 तक विकसित भारत का सपना देख रहे हैं और भारतमाला मार्ग, समृद्धि मार्ग जैसे नए रास्तों के निर्माण सहित विकास की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
श्री अक्षय मुनि जी मसा ने कहा कि मनुष्य की जिद कई बार युद्ध का कारण बनती है, इसलिए युद्ध से बचना चाहिए। जीवन में तपस्या का विशेष महत्व है और प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन तप में लीन रहने का प्रयास करना चाहिए। सुबह उठते ही कोई न कोई नियम अवश्य लेना चाहिए तथा आत्मा के पोषण पर ध्यान देना चाहिए। आत्मिक उन्नति के मार्ग पर चलकर ही मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। उन्होंने पंच परमेष्ठि को शाश्वत सत्य बताते हुए धन-दौलत के प्रति अत्यधिक मोह नहीं रखने की प्रेरणा दी।
उन्होंने कहा कि जब आत्मा में जागरण आता है, तब अनेक विषयों के प्रति मोह अपने आप कम होने लगता है। भगवान ने विवेक के माध्यम से धर्म का मार्ग बताया है। धार्मिक कथाएं केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि उनके माध्यम से व्यक्ति जागरूक भी हो सकता है। सामायिक के दौरान पल-पल सावधान रहना और अपनी चेतना को जागृत रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अभिमानी व्यक्ति अपने व्यवहार से स्वयं को प्रदर्शित करता है, जबकि स्वाभिमानी व्यक्ति को अपनी श्रेष्ठता दिखाने की आवश्यकता नहीं होती।
जैन मुनि ने पक्षियों और किसानों का उदाहरण देते हुए आत्मविश्वास के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने आचरण पर विचार करना चाहिए। रावण का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि बुराइयां व्यक्ति के भीतर भी हो सकती हैं, इसलिए आत्ममंथन जरूरी है। राष्ट्र धर्म के विरोध में कार्य नहीं करना चाहिए। उन्होंने गौ रक्षा के साथ-साथ परिवार, धर्म और राष्ट्र की रक्षा करने का आह्वान किया। साथ ही चेतावनी दी कि आलस्य की कीमत अंततः व्यक्ति को चुकानी पड़ती है।
उन्होंने कहा कि आज पूरा विश्व मन को बहलाने में लगा हुआ है, जबकि मन का सही उपयोग करना चाहिए। समस्याओं के केवल लक्षणों पर ध्यान देने के बजाय उनके मूल कारणों को समझकर समाधान करना जरूरी है। उन्होंने भगवान श्रीराम का उदाहरण देते हुए कहा कि सत्य के मार्ग पर चलने के लिए कभी-कभी अकेले भी आगे बढ़ना पड़ता है। दुनिया चाहे जिस दिशा में जाए, किसी का अहित नहीं करना चाहिए और सत्य की आराधना करते रहना चाहिए।
धन के प्रति अत्यधिक लालच पर उन्होंने कहा कि गंभीर बीमारी या कठिन परिस्थिति आने पर धन भी हमेशा काम नहीं आता, इसलिए जीवन में धन से अधिक मानवीय मूल्यों को महत्व देना चाहिए। छोटे व्यक्ति का कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिए। भगवान श्रीराम, भगवान महावीर और राजा हरिश्चंद्र के आदर्शों का उल्लेख करते हुए उन्होंने सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि दूसरों को नुकसान पहुंचाना आसान है, लेकिन अपनी बुराइयों पर विजय प्राप्त करना कठिन है। जो व्यक्ति मुसीबत में हो, उसका साथ देना चाहिए, जबकि गलत नीयत रखने वाले व्यक्ति का साथ छोड़ देना चाहिए।
तपस्या की कड़ी में 11 उपवास का प्रत्याख्यान
जैन मुनि की प्रेरणा से तपस्या की कड़ी में संकेत ललवानी ने 7 उपवास तथा अजय बाफना ने 4 उपवास की तपस्या का प्रत्याख्यान ग्रहण किया। इस प्रकार दोनों तपस्वियों ने अपनी-अपनी तपस्या का संकल्प लिया। प्राप्त जानकारी के अनुसार, अब तक 1981 संवर भाइयों में पूर्ण हो चुके हैं।
प्रवचन के माध्यम से श्री अक्षय मुनि जी मसा ने आशावादी दृष्टिकोण अपनाने, आत्मजागरण करने, तपस्या और संयम को जीवन में स्थान देने तथा सत्य, करुणा और मानवीय मूल्यों के मार्ग पर चलने का संदेश दिया।




